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2020-10-27

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दिवाली कब है जानें सही तिथि, इसलिए है अबकी बार उलझन की स्थिति

दिवाली आने में अब एक महीने से भी कम का वक्त बचा है। जो लोग अपने घर से दूर बाहर रह रहे हैं वह दिवाली पर घर जाने की तैयारी में जुटे हुए हैं। लेकिन इन तैयारियों के बीच एक उलझन की स्थिति भी बनी हुई है कि इस साल दिवाली कब मनायी जाएगी। दरअसल शास्त्रों में बताया गया है कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को दिवाली का त्योहार मनाना चाहिए और इसी दिन स्थिर लग्न में गृहस्थों को देवी लक्ष्मी के साथ गणेशजी और कुबेर महाराज की पूजा करनी चाहिए।

इस साल उलझन इसलिए हो गई है कि 14 नवंबर और 15 नवंबर इन दोनों दिनों में अमावस्या तिथि है। अमावस्या तिथि 14 नवंबर को दिन में 2 बजकर 18 मिनट से लग रही है। 15 नवंबर को अमावस्या दिन में 10 बजकर 37 मिनट तक है। ऐसे में सवाल यह है कि किस दिन दिवाली का त्योहार मनाना शास्त्रसम्मत होगा। आपको बता दें कि इस सवाल का जवाब ब्रह्मपुराण में दिया गया है कि कार्तिक मास की अमावस्या तिथि की मध्यरात्रि में मां लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं और सद्गृहस्थों के घर में आपने आशीर्वाद स्वरूप में विराजमान होती हैं।

यानी जिस दिन मध्य रात्रि में निशीथ काल में अमावस्या तिथि हो उसी तिथि को दीपावली पूजन के लिए ग्रहण करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है। अमावस्या तिथि प्रदोष व्यापिनी यानी प्रदोष काल में हो और आधी रात में भी लग रही हो तो यह बहुत ही उत्तम होता है।

शास्त्रों के इसी नियम के अनुसार 14 नवंबर का दिन दिवाली के लिए सर्वथा उत्तम है। क्योंकि 14 नवंबर को प्रदोष काल में और मध्यरात्रि में भी अमावस्या है। 15 नवंबर को प्रदोष काल और मध्यरात्रि में अमावस्या नहीं होने की वजह से इस दिन दिवाली नहीं मनाई जाएगी। 15 नवंबर को पितृकार्य और कार्तिक स्नान का आरंभ करना शास्त्र सम्मत होगा।

  • 13 नवंबर को धनतेरस और हनुमान जयंती
  • 14 नवंबर नरक चतुर्दशी और दिवाली पूजन
Diwali 2020 Date: नवरात्रि के साथ ही त्योहार भी शुरू हो जाते हैं। इस साल 25 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा। उसके बाद दिवाली (दीपावली) का त्योहार धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाएगा। हिंदी पंचांग के अनुसार, दिवाली का त्योहार हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। दिवाली के दिन धन और ऐश्वर्य की माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। हालांकि इस साल मलमास के कारण दिवाली में विलंब है। जिसके कारण दिवाली की तारीख को लेकर लोगों के बीच भ्रम है। जानिए इस साल दिवाली का त्योहार किस तारीख को है और क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त-

कब है दिवाली 2020 (When is Deepawali 2020)-

इस साल कार्तिक मास की अमावस्या 14 नवंबर 2020 को पड़ रही है। अमावस्या तिथि 14 नवंबर से प्रारंभ होकर दोपहर 2 बजकर 17 मिनट से अगले दिन 15 नवंबर को सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक रहेगी। ऐसे में दिवाली 14 नवंबर को मनाई जाएगी।

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दिवाली 2020 शुभ पूजन मुहूर्त ( Diwali 2020 Lakshmi Pujan Timing)-

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: 14 नवंबर की शाम 5 बजकर 28 मिनट से शाम 7 बजकर 24 मिनट तक।

प्रदोष काल मुहूर्त: 14 नवंबर की शाम 5 बजकर 28 मिनट से रात 8 बजकर 07 मिनट तक

वृषभ काल मुहूर्त: 14 नवंबर की शाम 5 बजकर 28 मिनट से रात 7 बजकर 24 मिनट तक 

चौघड़िया मुहूर्त में करें लक्ष्मी पूजन-

दोपहर में लक्ष्मी पूजा मुहूर्त- 14 नवंबर की दोपहर 02 बजकर 17 मिनट से शाम को 04 बजकर 07 मिनट तक।

शाम में लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त- 14 नवंबर की शाम को 05 बजकर 28 मिनट से शाम 07 बजकर 07 मिनट तक।

रात में लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त- 14 नवंबर की रात 08 बजकर 47 मिनट से देर रात 01 बजकर 45 मिनट तक।

प्रात:काल में लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त- 15 नवंबर को 05 बजकर 04 मिनट से 06 बजकर 44 मिनट तक।

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दिवाली का महत्व-
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम लंका विजय कर पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास पूरा करने के बाद अयोध्या लौटे थे। तब अयोध्या का हर घर दीपक और रोशनी से जगमगा उठा था। अयोध्यावासियों ने भगवान राम के घर लौटने की खुशी में घर को दीपों से सजाया था। तब से हर साल कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली या दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। 

दिवाली और लक्ष्मी पूजा
माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये इस दिन को बहुत ही शुभ माना जाता है। घर में सुख-समृद्धि बने रहे और मां लक्ष्मी स्थिर रहें इसके लिये दिनभर मां लक्ष्मी का उपवास रखने के उपरांत सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष काल के दौरान स्थिर लग्न (वृषभ लग्न को स्थिर लग्न माना जाता है) में मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये। लग्न व मुहूर्त का समय स्थान के अनुसार ही देखना चाहिये।

Diwali 2020: कब है दीपावली और क्या है इस त्यौहार का महत्व, जानें यहां
दीपवली 2020 की शुभ तिथि और शुभ पूजन मुहूर्त:

  1. दिवाली की तिथि: 14 नबंवर 2020
  2. अमावस्या तिथि प्रारम्भ: 14 नबंवर 2020 दोपहर 2 बजकर 17 मिनट से
  3. अमावस्या तिथि समाप्त: अगले दिन सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक (15 नबंवर 2020)
  4. लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: शाम 5 बजकर 28 मिनट से शाम 7 बजकर 24 मिनट तक (14 नबंवर 2020)
  5. प्रदोष काल मुहूर्त: शाम 5 बजकर 28 मिनट से रात 8 बजकर 07 मिनट तक
  6. वृषभ काल मुहूर्त: शाम 5 बजकर 28 मिनट से रात 7 बजकर 24 मिनट तक
दिवाली कब है (Diwali 2020 Date)
Diwali 2020 Date In India / When Is Diwali Kab Hai 2020: कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली पूजन (महालक्ष्मी पूजा) का विधान है। दिवाली से पहले करवा चौथ, गौत्सव, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, छोटी दिवाली और फिर दिवाली का पर्व आता है। दिवाली के एक दिन बाद गोवर्धन पूजा, अन्नकूट महोत्सव, भाई दूज और विश्वकर्मा पूजा की जाती है। हिन्दुओं का सबसे बड़ा दिवाली का पर्व पूरे विश्व में पांच दिन तक मनाया जाता है। आइये जानते हैं करवा चौथ कब है, गौत्सव कब है, धनतेरस कब है, नरक चतुर्दशी कब है, छोटी दिवाली कब है और दिवाली कब है, गोवर्धन पूजा कब है, अन्नकूट महोत्सव कब है, भाई दूज कब है और विश्वकर्मा पूजा कब है।

When Is Diwali 2020: दिवाली कब है 2020 ? दिवाली 2020 में 14 नवंबर को मनाई जाएगी। दिवाली का पर्व कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। दिवाली पर माता लक्ष्मी, कुबेर जी और भगवान श्री गणेश की पूजा का विधान है।

दिवाली 2020 तिथि और शुभ मुहूर्त (Diwali 2020 Date Time Muhurat) 
दिवाली की तिथि: 14 नबंवर 2020 
अमावस्या तिथि प्रारम्भ: 14 नबंवर 2020 दोपहर 2 बजकर 17 मिनट से 
अमावस्या तिथि समाप्त: अगले दिन सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक (15 नबंवर 2020) 
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: शाम 5 बजकर 28 मिनट से शाम 7 बजकर 24 मिनट तक (14 नबंवर 2020) 
प्रदोष काल मुहूर्त: शाम 5 बजकर 28 मिनट से रात 8 बजकर 07 मिनट तक 
वृषभ काल मुहूर्त: शाम 5 बजकर 28 मिनट से रात 7 बजकर 24 मिनट तक 

दिवाली पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त (Diwali Pujan Shubh Choghadiya Muhurat)
दिवाली लक्ष्मी पूजन सुबह का मुहूर्त 
शुभ मुहूर्त: सुबह 08:06 से 09:27 तक 
चर मुहूर्त: दोपहर 12:11 से 01:33 तक 
लाभ मुहूर्त: दोपहर 01:33 से 02:54 तक 
अमृत मुहूर्त: दोपहर 02:54 से शाम 04:16 तक 
दिवाली लक्ष्मी पूजन रात/रात्रि का मुहूर्त लाभ मुहूर्त: शाम 05:38 से 07:16 तक.

दिवाली की पूजा विधि (Method Of Diwali Pujan) 
  1. दिवाली के दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है।
  2. इस दिन घर के सभी लोगो शाम के समय स्नान करने के बाद कोरे वस्त्र धारण करने चाहिए।
  3. इसके बाद एक चौकी पर गंगाजल छिड़कर उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं।
  4. कपड़ा बिछाने के बाद खील और बताशों की ढेरी लगाकर उस पर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी की प्रतिमा और कुबेर जी की प्रतिमा स्थापित करें।
  5. इसके बाद कुबेर जी प्रतिमा भी स्थापित करें और साथ ही कलश की स्थापना भी करें । उस पर स्वास्तिक बनाकर आम के पत्ते रखें और नारियल स्थापित करें।
  6. कलश स्थापित करने के बाद पंच मेवा, गुड़ फूल , मिठाई,घी , कमल का फूल ,खील और बातसे भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के आगे रखें।
  7. इसके बाद अपने घर के पैसों, गहनों और बहीखातों आदि को भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के आगे रखें।
  8. यह सभी चीजें रखने के बाद घी और तेल के दीपक जलाएं और विधिवत भगवान गणेश और माता लक्ष्मी जी की पूजा करें।
  9. माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप और साथ ही श्री सूक्त का भी पाठ करें।
  10. पूजा समाप्त होने के बाद अंत में अपने घर के मुख्य द्वार पर तेल के दो दीपक अवश्य जलाएं और साथ ही अपनी तिजोरी पर भी एक दीया अवश्य रखें।
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दिवाली की कथा (Diwali Pooja Story) पौराणिक कथा के अनुसार एक गांव में एक साहुकार रहा करता था। उसकी एक बेटी थी जो रोज पीपल पर जल चढ़ाया करती थी। जिस पेड़ को वह जल देती थी वहां पर लक्ष्मी जी भी वास करती थी। लक्ष्मी जी उस साहुकार की लड़की से बहुत अधिक प्रसन्न थी। जिसके बाद उन्होंने उस लड़की से मित्र बनने की इच्छा प्रकट की। लड़की ने कहा कि मैं अपने पिता से इस विषय में पूछूंगी। जब उसने अपने पिता को इस बारे में बताया तो उसके पिता ने इसके लिए हां कर दी। जिसके बाद वह एक दिन लक्ष्मी जी साहुकार की बेटी को अपने घर लेकर आ गई। उन्होने साहुकार की पुत्री का बहुत स्वागत किया। जब साहुकार की बेटी जाने लगी तो लक्ष्मी जी ने पूछा कि अब तुम मुझे अपने घर कब बुलाओगी। जिसके बाद एक दिन उसने लक्ष्मी जी को अपने घर बुलाया लेकिन उसकी वह बहुत ही निर्धन थी। जिसके कारण उसके मन में डर था कि वह लक्ष्मी जी का स्वागत कैसे करेगी। उसके पिता ने जब उसकी यह हालत देखी तो उससे कहा कि तू घर की सफाई करके चार बाती वाला दीपक जला और लक्ष्मी जी को याद कर। उसी समय एक चील अपनी चोंच में नोलखा हार लेकर जा रही थी और उसने उस हार को साहुकार के घर पर डाल दिया। जिसे बेचकर उसने लक्ष्मी जी के स्वागत की तैयारी की। लक्ष्मी जी भगवान गणेश के साथ उसके घर में पाधारी। साहुकार की बेटी ने उन दोनों की खूब सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने साहुकार को अमीर बना दिया।
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शारदा पूजा 2020 तिथि (Sharda Puja 2020 Date Time) 14 नवंबर 2020 
शारदा पूजा 2020 शुभ मुहूर्त (Sharda Puja 2020 Shubh Muhurat) 
  • दीवाली शारदा पूजा के लिए शुभ चौघड़िया मुहूर्त अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) - दोपहर 2 बजकर 17 मिनट से शाम 4 बजकर 07 मिनट तक 
  • सायाह्न मुहूर्त (लाभ) - शाम 5 बजकर 28 मिनट से शाम 7 बजकर 07 मिनट तक 
  • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) - रात 8 बजकर 47 मिनट से रात 1 बजकर 45 मिनट तक 
  • उषाकाल मुहूर्त (लाभ) - सुबह 5 बजकर 04 मिनट से सुबह 6 बजकर 44 मिनट तक (15 नवंबर 2020) 
  • अमावस्या तिथि प्रारम्भ - दोपहर 02 बजकर 17 मिनट से (14 नवंबर 2020) 
  • अमावस्या तिथि समाप्त - अगले दिन सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक (15 नवंबर 2020).
शारदा पूजा का महत्व (Sharda Puja Ka Mahatva)
शारदा पूजा का महत्व (Sharda Puja Ka Mahatva) शारदा पूजा दिवाली के दिन ही की जाती है। इस दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के साथ ही माता शारदा यानी सरस्वती की पूजा करना बहुत ही शुभ माना जाता है। माता शारदा को ज्ञान, विद्या और बुद्धि की देवी माना जाता है। इसी कारण से दिवाली के दिन इनकी पूजा का विशेष महत्व होता है। विद्यार्थियों को तो इस दिन माता सरस्वती की पूजा अवश्य ही करनी चाहिए। जिससे उनकी विद्या में किसी भी प्रकार कोई समस्या न आए।

माता शारदा की पूजा व्यापार करने वाले वाले लोगों की अधिक महत्वपूर्ण होती है। गुजरात में इस दिन चोपड़ा यानी नए बहीखातों की शुरुआत होती है। इस दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के साथ देवी सरस्वती की पूजा करने से धन और संपन्नता तो बढ़ती ही है साथ ही ज्ञान में भी बढ़ोतरी होती है। गुजरात में शारदा पूजा न केवल दिवाली पूजा के नाम से प्रसिद्ध है बल्कि चोपड़ा पूजा के नाम से भी प्रसिद्ध है।

मां शारदा की कथा (Mata Sharda Ki Katha) 
मां शारदा की कथा (Mata Sharda Ki Katha) पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने ब्रह्मदेव को संसार की रचना का आदेश दिया था। जिसके बाद ब्रह्मा जी ने सभी जीवों विशेषकर मनुष्य की रचना की। लेकिन ब्रह्मदेव को इससे भी संतुष्टि प्राप्त नही हुई। ब्रह्मा जी को लगता था कि संसार में अभी भी कुछ कमी है क्योंकि हर तरफ ही मौन का वातावरण है। इसके बाद ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु से आज्ञा पाकर अपने कमंडल में से जल लेकर छिड़काव किया। पृथ्वीं पर जैसे ही ब्रह्मा जी के कमंडल का जल गिरा उसी समय धरती पर कंपन होने लगा। जिसके बाद वृक्षों से अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। यह शक्ति एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री थी। जो वीणा और वर मुद्रा के साथ प्रकट हुई थीं। उनके अन्य हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा जी ने उस देवी से वीणा बजाने के लिए कहा। जैसे ही उस देवी ने वीणा बजाई वैसे ही संसार के सभी प्राणियों को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल होने लगा। पवन से सरसराहट की आवाज आने लगी। उस समय ब्रह्मा जी ने उस देवी को सरस्वती नाम से संबोधित किया। माता सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी जैसे नामों से भी जाना जाता है।
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